आदमी ही आदमी को
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आदमी ही आदमी को आज छलता जा रहा।
हर समय भूतल तवा सा आज जलता जा रहा।।
नेकियां अब तो सभी फरेब बनती जा रही ।
भाई ही भाई को अब तो रोज खलता जा रहा ।।
स्वार्थ के
परिवेश में सब सेकते हैं रोटियाँ ।
आस्तीनों में सभी की सांप पलता जा रहा ।।
आज तो सीमाओं पर गद्दार पैदा हो रहे।
देख लो अब इस जहाँ में दौर चलता जा रहा।।
देखकर राधे वतन में इस तरह की सूरतें।
आज मक्कारों को भोला वतन फलता जा रहा।।
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Friday, 24 April 2020
ग़ज़ल, " आदमी ही आदमी को " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ),
Friday, 13 September 2019
ग़ज़ल, समंदर का किनारा " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )
समंदर का किनारा
मैं समंदर का किनारा देखती हूँ
जो नहीं करता है वो इशारा देखती हूँ
छोड़कर मुझको गए थे तुम जिधर
मैं वहीं मुड़कर दुबारा देखती हूँ
खोलकरके मैं झरोखा चांद को हूँ देखती
चांद के संग तो गगन में मैं सितारा देखती हूँ
ख्वाब मैं तो रोज ही यू चले आते हो तुम
नींद मेरी नैन मेरे क्यों ख्याब तेरा देखती हूँ
राधे को विश्वास है अपने प्रभु पर
आ रहा जो कल हमारा देखती हूँ
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Wednesday, 10 July 2019
ग़ज़ल, " सब कुछ सिखाना " (राधा तिवारी " राधेगोपाल " )
सब कुछ सिखाना
कम पड़ रही है तनख्वाह महंगा जमाना है
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Tuesday, 9 July 2019
ग़ज़ल, " सबसे प्यार कीजिए "(राधा तिवारी "राधेगोपाल ")
सबसे प्यार कीजिए ज़िद त्याग करके गलतियां स्वीकार कीजिए बैर दंभ छोड़ सबसे प्यार कीजिए
है हिंद अपना शान से कहते रहो सदा
ना युद्ध करके जिंदगी बेकार कीजिए
मेहमान का तो आगमन ईश्वर से कम नहीं
ईश्वर के जैसे उनसे व्यवहार कीजिए
अपने जो रूठ जाए तो कैसा नसीब है
मनाने उनको खुशामद ए दरकार कीजिए
दूर रहके राधे तुम यूँ पास में रहो
करीब हो बता कर इजहार कीजिए
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Thursday, 6 June 2019
ग़ज़ल, " ताप सूरज का" ( राधा तिवारी )" राधेगोपाल "
ताप सूरज का
ताप सूरज का धरा को खा रहा
दुख सभी का है दिलों पर छा रहा
पीर हर कर बांट लो खुशियांँ यहाँ
दुख का बादल पास सबके आ रहा
प्यार से इंसान अब रहता नहीं
जानवर पर भी सितम वो ढा रहा
चल रहा था जो अभी तक शान से
चार कांधों पर अभी वो जा रहा
जन्म लेता है शिशु के रूप में
अंत भी वह साथ अपने ला रहा
श्रम करें इंसान इतना इस जहांँ में
पर कहाँ आराम फिर भी पा रहा
जी रही राधे यहांँ अब गर्दिशों में
किंतु फिर भी ये जगत है भा रहा
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Saturday, 1 June 2019
ग़ज़ल, "प्रीत की चदरिया" ( राधा तिवारी )" राधेगोपाल "
प्रीत की चदरिया
शीशा समझ के दिल को अब सब ही तोड़ते हैं
नींबू के जैसे रिश्ते अब सब निचोड़ते हैं
आना कभी धरा पर इंसा को रचने वाले
देखो तो आकर कैसे सब मुंह मोड़ते हैं
जब था बनाया तुमने इंसा को एक जैसा
मजहब बना कर अब वो दीवार जोड़ते हैं
संसार में नहीं है कोई हिंदू सिख इसाई
अब प्रीत की चदरिया सब लोग ओढते हैं
गीतो ग़ज़ल में राधे समझा कर सबको हारी
मिट्टी की हांडी अब तो सब लोग फोड़ते हैं
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Friday, 31 May 2019
ग़ज़ल, "कलम पर हो रहे भारी" ( राधा तिवारी " राधेगोपाल ")
कलम पर हो रहे भारी
मेरी हर सोच मेरे बोल कलम पर हो रहे भारी
लिखाती है वही लिखती हूँ कैसी है ये लाचारी
ख्यालों में ही खो करके तुम्हारा नाम लेती हूँ
यादों के झरोखे भी कलम पर हो रहे भारी
तुम्ही हो सोच में मेरे तुम्हें ही सोचती हरदम
मेरे हर सोच ती जानम कलम पर हो रहे भारी
नजर में तू मगर फिर भी यह नैना ढूंढते तुझको
जगत के लोग भी साजन कलम पर हो रहे भारी
कहे राधा के लेखक की कलम में जान होती है
जगत के जीव निर्जीव भी कलम पर हो रहे भारी
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Sunday, 12 May 2019
ग़ज़ल, "इजहार धीरे-धीरे" (राधा तिवारी "राधेगोपाल ")
इजहार धीरे-धीरे
करते है प्रेम का वो इजहार धीरे-धीरे
इंकार धीरे धीरे इकरार धीरे-धीरेकहते हैं वो की राधे कुछ लिख नहीं सकेगी
लेकिन दुआ वो करते हर बार धीरे-धीरे
मर्ज वो लगा है बचना नहीं है मुमकिनदेते दवा भी वो तो हर बार धीरे-धीरेजीने को इस धरा पर विष सारे पी रहे हैंहर बार वो पिलाते मधुधार धीरे-धीरेआते हैं पास अक्सर ख्वाबों में रात को वोआकर जगा रहे हैं हर बार धीरे-धीरेकरके इशारे अक्सर वो बात अपनी कहते
दिल में उतर रहे हैं हर बार धीरे-धीरे
कुछ भी नही है रिश्ता राधे का उनसे कोई
पर बन रहे हैं अब वो सरकार धीरे-धीरे
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Tuesday, 7 May 2019
ग़ज़ल, " दिल की हसरत " (राधा तिवारी "राधेगोपाल ")
दिल की हसरत
दिल की हसरत है आज उनको तो मनाने की
उनकी आदत है सदा ही रूठ जाने की
तोड़कर दिल को तो वह जाते अक्सर
निभाई रीत है उनने तो अक्सर ही गिराने की
पौछ डाले हैं अब तो आंख के आंसू
उनकी आदत
है सदा ही रुलाने की
संभाल के हम सदा
कदम को रखते हैं
कोशिश वह किए हैं सदा गिराने की
दूर राधे से जाने की कोशिश ना करना
बात करती है रिश्तो को सदा निभाने की
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Saturday, 4 May 2019
ग़ज़ल, ' इंसाफ' (राधा तिवारी' राधेगोपाल )'
इंसाफ
आईने को साफ करके देख लिया
हमने सबको माफ करके देख लिया
मानते अब बात कोई भी नहीं है
मिन्नतों को हमने करके देख लिया
दूध में सागर उड़ेला है उन्होंने
हमने तो इंसाफ कर के देख लिया
सब बुढ़ापे में
रहते है अकेले ही
दुनिया से भी आस करके देख लिया
दिल नहीं लगता कहीं भी इस जहां में
रास मोहन सा करके देख लिया
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Sunday, 24 March 2019
ग़ज़ल, "दीप " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )
दीप
दीप नन्हा सा धरा पर जल रहा है
उजियार उसमें दो जहां का पल रहा है
नेकिया सब काम आएंगी तुम्हारी
बदकिस्मती का दौर देखो चल रहा है
रिश्ते नातों की जहाँ थी डोर पक्की
भाई ही भाई को अब तो छल रहा है
झूठ अब तो सिर पे चढ़कर बोलता है
सत्य अब तो है सभी को खल रहा है
श्रवण बनकरके रहो तुम इस धरा पर
याद अब राधे को अपना कल रहा है
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