हिम पर्वतों को तो अब नित ही पिघलना चाहिए ll
देश की सीमा में बढ़कर देश का रखते जो ध्यान l
बनने को ऐसे वीर हम सबको मचलना चाहिए ll
दीन दुर्बल और निर्धन है सभी अपने सखा l
बीमार वृद्ध को देखकर तो दिल दहलना चाहिए ll
बैठना दिन-रात सोना है नहीं अच्छा कभी l
नींद त्यागो जागकर हर पल टहलना चाहिए ll
राधे कहे दिखता हमें यह सब जहाँ तो एक सा l
बढ़ चलो आगे रहो अब युग बदलना चाहिए ll
|
Showing posts with label ग़ज़ल "सूरज निकलना चाहिए "(राधा तिवारी" राधेगोपाल "). Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल "सूरज निकलना चाहिए "(राधा तिवारी" राधेगोपाल "). Show all posts
Saturday, 4 August 2018
ग़ज़ल "सूरज निकलना चाहिए" (राधा तिवारी" राधेगोपाल ")
Subscribe to:
Posts (Atom)
