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Wednesday, 13 May 2020

दोहे , श्रम " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ),


श्रम
मजदूर | न्यूज़क्लिक
श्रम की कीमत जानते,हैं जग में विद्वान।
बिना काम के तो यहाँ,मिलता कैसे ज्ञान।।1।।

खड़ा हुआ बाजार में, बिकता हूँ मैं रोज।
सूरज लेता है सदा, मजदूरों का ओज।।2।।

तन भूखा रहता मगर ,मन में रहती आस।
पेट भरेगा शाम को, करता हूँ विश्वास।।3।।

देखो मैं हूँ आज फिर, बिकने को तैयार।
चौराहे पर हूँ खड़ा, तुम आओ बाजार ।।4।।

मिले नहीं मुझको अगर, किसी रोज तो काम।
दुखी ह्रदय से जा रहा उस दिन मैं निज धाम।।5।।

बीवी पूछेगी मुझे, कितना लाए दाम।
फूटी किस्मत का नहीं, जिक्र करूँगा आम।।6।।

घर में जाकर देखते, बच्चे खाली हाथ।
रोज नहीं मजदूर का, ईश्वर देते साथ।।7।।