Saturday, 4 August 2018

ग़ज़ल "सूरज निकलना चाहिए" (राधा तिवारी" राधेगोपाल ")


सूरज निकलना चाहिए 
अंधियार छाँटने को अब सूरज निकलना चाहिए l  
 हिम पर्वतों को तो अब नित ही पिघलना चाहिए ll

 देश की सीमा में बढ़कर देश का रखते जो ध्यान  l
बनने को ऐसे वीर हम सबको मचलना चाहिए  ll

दीन दुर्बल और निर्धन है सभी अपने सखा l
 बीमार वृद्ध को देखकर तो दिल दहलना चाहिए ll

 बैठना दिन-रात सोना है नहीं अच्छा कभी l
 नींद त्यागो जागकर हर पल टहलना चाहिए ll

 राधे हे दिखता हमें यह सब जहाँ तो एक सा l
 बढ़ चलो आगे रहो अब युग बदलना चाहिए ll