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Saturday, 14 July 2018

पुस्तक निमोचन "आमन्त्रण स्वीकार करें"

कृपया राधा तिवारी का 
आमन्त्रण स्वीकार करें।
मान्यवर,
     साहित्य शारदा मंच, खटीमा द्वारा 15 जुलाई, 2018 को अपराह्न् 2 बजे से पुस्तक विमोचन एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया रहा है। जिसमें-
श्रीमती राधा तिवारी (राधेगोपाल) द्वारा रचित “सृजन कुंज” (काव्य संग्रह) एवं “जीवन का भूगोल” (दोहा संग्रह) का विमोचन।
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका "ट्रू मीडिया" जुलाई - 2018 अंक का विमोचन।
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तत्पश्चात कवि गोष्ठी
जिसका सीधा प्रसारण ट्रू मीडिया द्वारा चैनल पर किया जायेगा।
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हमारे अभ्यागत
डॉ. राकेश चन्द्र रस्तोगी, (सी.एम.डी. खटीमा फाइबर्स), माननीय पुष्कर सिंह धामी मा.ओमप्रकाश (सम्पादक-ट्रू मीडिया-दिल्ली) मा. विजय नाथ शुक्ल (उप जिलाधिकारी), गोपाल दत्त तिवारी, भुवन चन्द्र कापड़ी, श्रीमती सोनी महरा (खण्ड शिक्षा अधिकारी), डॉ.सिद्धेश्वर सिंह, डॉ. मुकेश कुमार।
इस अवसर पर आप सादर आमन्त्रित हैं।
स्थान- ब्लॉक सभागार, खटीमा (ऊधमसिंहनगर)
समय-अपराह्न 2 बजे से

निवेदक
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक   डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय नन्द    श्रीमती राधातिवारी
   अध्यक्ष            महासचिव                कोषाध्यक्ष

एवं समस्त सदस्य व पदाधिकारीगण।
साहित्य शारदा मंच (पंजीकृत), खटीमा (ऊधमसिंह नगर)
मोबाइल नम्बर-
7906360576,   708188951,  9997771969


Friday, 13 July 2018

बाल कविता " पंछी" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

 पंछी
नभ में सूरज है आता।
जाने कहाँ चन्द्र छिप जाता।

 पंछी छोड़ घोसलें आते।
 नभ में उड़ कर खुश हो जाते।।

 बच्चे भरते हैं किलकारी ।
वो लगती  है कितनी प्यारी ।।

नीरवता कुल रात समाई।
किन्तु धरा भी है मुसकाई।।

 माँ ने अब आवाज लगाई।.
छोड़ो बिस्तर और रजाई।l

 दिन में करना पूरे काम।
 रातों को लेना विश्राम।।

Thursday, 12 July 2018

कविता"कर दो कान्हा भव से पार" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

कर दो कान्हा भव से पार
 तुम कान्हा हो मैं हूं राधा।
 मेरा जीवन तुम बिन आधा।।

 दूर अगर  चाहोगे जाना।
 फिर मुश्किल है हम को पाना ।।

बंधी तुम्हीं से जीवन डोर ।
खींच रही जो तेरी ओर।।

 तुमसे जीवन में उजियारा ।
चहूँ ओर तुम बिन अंधियारा ।।

तुमसे मेरी जीवन नैया।
 तुम बन बैठे हो खेवैया ।।

तुम राधा के तारणहार ।
कर दो कान्हा भव से पार।।


Wednesday, 11 July 2018

कविता "राधे की बिंदी और पायल" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )


 राधे की बिंदी और पायल
 राधे की बिंदी और पायल।
 कान्हा को करती है घायल।।

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 क्यों इनको तुम झनकाती हो।
 मंद मंद क्यों मुस्कुराती हो।।

 तेरी मेरी प्रीत पुरानी ।
कभी ना कहना इसे कहानी।।

 तुमने कि इस दिल की चोरी।
 मैं चंदा तू मेरी चकोरी।।

 पास मेरे तुम सदा ही रहना।
 सुख दुख अपने हमको कहना।।

 मेरे दिल में रहती हो तुम ।
मुझको अच्छी लगती हो तुम।।

 तुममें मैं हूँ मुझ में तुम हो ।
फिर जाने क्यों तुम गुमसुम हो।



Tuesday, 10 July 2018

बाल कविता" मात- पिता" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

  मात- पिता
मात- पिता के ऋणी रहेंगे।
 उनका आदर सदा करेंगे ।।

दुनिया है दिखलाई हम को।
 लेकर मेरे सारे गम को।।

 अपनी दुनिया हमें बताया।
 हम को दे दी अपनी छाया ।।

बनकर के सबके भगवान ।
सबको देते जीवनदान।।

 अपने सारे दुख छिपाते।
पर हम पर खुशियां बरसाते ।।

नहीं सरिखा तुमसा जग में ।
फूल आप दिखलाते मग में ।।

राधा है अनुयाई हरदम ।
जीवन में मत देना गम।।



Monday, 9 July 2018

बाल कविता " धरा में किरणें बिखराते हो"( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

 धरा में किरणें बिखराते हो
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 रवी तुम्हारा इंतजार ।
कर रहा सारा संसार।।

 लगते हो तुम सबको प्यारे।
 नभ मे हो तुम सबसे न्यारे।।

 आसमान में जब आते हो।
 धरा में किरणें बिखराते हो।।

 जो भी दर्श तुम्हारा पता ।
नई उर्जा तुमसे पाता ।।

पक्षी  कलरव करने लगते।
 इंसान तुमको देख कर जगते।।

 बीत गई अब काली रात।
 अब कर लो सब काम की बात।।

Sunday, 8 July 2018

दोहे "रखो मधुर संबंध" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

रखो मधुर संबंध
खेल रहे जग में सभी, यहाँ अनोखा खेलl
  कभी जुदाई है यहाँ, और कभी है मेलll

बदल गया कितना यहां, दुनिया का व्यवहारl
 आंगन में अब हो गई, खड़ी एक दीवारll

दुर्घटना को टाल दो, मत होना दो चार l
 चाल नियंत्रण में रखो, जो जीवन आधारll

अगर कभी जाना  पड़े , बाहर दिन दो चार l
 आना है फिर लौट कर, तुम को अपने द्वारll

 मन हर पल पुलकित रहे, रखो मधुर संबंधl
 घरवालों के साथ में, करो न कुछ अनुबंधll

 झूठ कभी टिकता नहीं, नहीं सत्य का अंतl
 झूठा सच मत बोलिए, कहते ज्ञानी संतll 


Saturday, 7 July 2018

दोहे " कान्हा मेरे साथ" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

 कान्हा मेरे साथ
रमे राम संसार में, सब बन आदर्शl
 पढ़कर राम चरित्र को, करो विचार विमर्शll

मुख्य पोती के सिंधु से, करते हैं सब प्यारl
 किंतु नहीं जाता कभी, कोई इसके पासll

 पंछी को अच्छा लगे, रहना सदा स्वच्छंदl
 इनको कभी न कीजिए, पिंजरे में तुम बंदll

साजन जी परदेस है, सजनी करें विचारl
 साजन के बिन व्यर्थ , सजनी का घर द्वारll

 जीवन में रहना सदा, कान्हा मेरे साथl
 राधे के तुम प्राण हो, सबके हो तुम नाथll

 जिस थाली में खाएंगे, रक़खो उसे संभालl
 भोजन के तुम साथ में, करना नहीं सवालll


Friday, 6 July 2018

बाल कविता "कागज की नाव" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

कागज की  नाव
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बारिश की रुत बड़ी सुहानी
 आसमान से बरसा पानी
 मेंढक टर्र टर्र टर्र चिल्लाए
 अपना अभिनव राग सुनाएं
 भरे हुए हैं ताल-तलैया
 मेंढक करते ता ता थैया
 भरे हुए हैं गड्डे नाली
 चारों ओर बिछी हरियाली
 कागज की एक नाव बनाओ
 गड्ढों में उसको तैराओ



Thursday, 5 July 2018

बाल कविता "बारिश " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

बारिश
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टपक रहा है टपटप पानी
 याद आ रही मुझको नानी 
 गरमा गरम पकोड़े लाती
 हमें प्यार से सदा खिलाती
 रंगबिरंगा छाता लेकर 
इधर-उधर नानी है जाती
 नानाजी को चाय पिलाती
 अदरक उसमें सदा मिलाती
 ठंडी से है हमें बचाती
 रोज सुनाती एक कहानी
 टपक रहा है टपटप पानी



Wednesday, 4 July 2018

दोहे " वसुंधरा की शान " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

वसुंधरा की शान
प्राणवायु देते हमें, जीवन का वरदानll

सूरज ने दिखला दिया, गर्माहट का जोशl
देख गर्म वातावरण, उड़ जाते हैं होशll

तिनका तिनका जोड़कर, पंछी बुनते नीड़l
गर्मी उतनी बढ़ रही, जितनी बढ़ती भीड़ll

ऊंचे ऊंचे शैल  हैं, इस धरती की शानl
जड़ी बूटी देते हमें, पर्वत है भगवानll

नील गगन में उड़ रहा, खग होकर बेचैन।
रहता सुख की खोज में, वह पंछी दिन रैन।।


Tuesday, 3 July 2018

वादे ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

वादे 
जो वादे  उन्होंने कभी किये थे चांदनी रात में हमसे l 
उन वादों को तोड़ कर वे जा रहे हैं  दूर आज हमसे ll 

नदिया किनारे शाम ढले रोज़ मिलते थे हमसे  l 
तुम तो सिर्फ मेरी हो , सदा यही कहते थे हमसे ll 

न जाने क्यों अब कुछ खफा  रहने लगे हैं हमसे  l 
कि अब तो सदा दूर ही रहा करते हैं हमसे ll 

वे तो प्यार करते थे हमे अपनी दिलों जान से l 
आज छोड़ गए ऐसे  ज्यों छोड़ा हो तीर कमान से ll 


Monday, 2 July 2018

"कहती है राधे गोपाल" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

प्यार और सम्मान
कभी रूप की धूप है सौपीं 
कभी कदम कदम पर घास 

कभी मनोबल ऊँचा करके 
जगाई कविता लिखने की आस 

कोमल वाणी है आपकी 
हँसता गाता बचपन 

सुख का सूरज सदा ही चमके 
उम्र भले हो पचपन 

प्यार और सम्मान आपका 
कभी भूल नहीं पायेंगे 

आपके सानिध्य में रह कर 
मधुर सुमन महक जायेंगे 

सूरज दिन को लेकर आता 
मन मेरा भी  हँसता गाता 

मयंक चमकता रातों में 
तब रस आता है बातों में 

मन है कितना विपुल विशाल 
कहती है " राधे गोपाल "

Sunday, 1 July 2018

( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )




दोहे "पूजा घर" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

पूजा घर
पूजा घर तो है यहां, सारे एक समान l 
 लेकिन ईश्वर को यहाँ, बांट रहा नादान ll 

 अद्भुत होती है सदा, जग की देखो रीत l 
 अपना तो कोई नहीं, लेकिन सबसे प्रीत ll

 जब जनमें इंसान सब, दिखते एक समान l 
 कुछ में तो शैतान है, कुछ में है इंसान ll 

 सुख में भुला न दीजिये, निज मन से भगवान l 
 दुख में करना चाहिए, ईश्वर का गुणगान ll 

सभी जगह रहते स्वयं, राम और रहमान l 
सबके दिल में है बसे, देखो परम निधान ll 

Saturday, 30 June 2018

दोहे "करना मत विश्राम" ( राधा तिवारी " राधेगोपाल ")


दीर्घ आयु के वास्ते, रखना मन में चाह।
जहाँ चाह होती वहाँ, मिल जाती है राह।।

हरा पेड़ मत काटना, कुदरत का सन्देश।
पेड़ों के कारण बने, निर्मल सब परिवेश।।

गिर जाते जब धरा पर, छाया वाले पेड़।
उनको खाने एकदम, आते बकरी-भेड़।।

आ जायें जब भी कभी, मन में बुरे विचार।
तब मन्त्रों का पाठ ही, मन के हरे विकार।।

रखना है अनमोल तन, हमको अगर निरोग।
कामुकता को त्याग कर, छोड़ दीजिए भोग।।

महिलाएँ तो किचन में, करतीं दिन भर काम।
सबको भोजन खिलाकर, करतीं है आराम।।

गर्मी धूप उन्हें लगे, जो करते हैं काम।
बड़े बुजुर्गों ने कहा, करना मत विश्राम।।

Thursday, 28 June 2018

बाल कविता " मेरी माँ" ( राधा तिवारी " राधेगोपाल ")



मेरी माँ

सुबह सवेरे चार बजे, 
मेरी माता जग जाती है l

दिन भर कि आपाधापी में, 
आराम कहाँ वो पाती है ll

मेरे सारे दुःख दर्द को, 
हँस कर गले लगाती है l

थकती होगी पर मेरे, 
सम्मुख वो मुस्काती है ll

गोदी में बैठा कर मुझको, 
अपना प्यार दिखाती है l

दिन भर कि आपाधापी में, 
आराम कहाँ वो पाती है ll

कभी न कहती ठीक नही हूँ, 
दुःख को सदा छिपाती है l 

मेरे दुःख को अपना कहती, 
मन ही मन हर्षाती है ll

मुझको कहती चंदा सूरज, 
नैनो में मुझे बसाती है  l

दिन भर कि आपाधापी में, 
आराम कहाँ वो पाती है ll 

Wednesday, 27 June 2018

ग़ज़ल " हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं" ( राधा तिवारी " राधेगोपाल ")


 हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं
लिखने को दिल की बातें मजबूर हो रहे हैं
हम लेखनी से अपनी मशहुर हो रहे हैं

मैं तो सदा हूँ  लिखती अच्छाई और बुराई
देते हैं दोस्त सारे हमको बहुत बधाई
लिखने को मन की बातें मजबूर हो रहे हैं
हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं

रहते थे आज तक तो परिवार मिलके सारे
 बिखरे हुए हैं देखो अब गर्दिशों के मारे
 रिश्ते सभी जहां में बेनूर हो रहे हैं
 हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं

मुश्किलें अधिक बढ़ेंगी जब काम कुछ करोगे
बेनूर जिंदगी में कुछ रंग जब भरोगे
 देखो खुशी के पल अब मगरूर हो रहे हैं
हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं

मां-बाप संंग रहे हम बनकर नवाब हरदम
 हर पल मिले खजाने, आँखे हुई न पुरनम
अब बोझ बढ़ रहा है मजदूर हो रहे हैं
 हम लेखनी से अपनी मशहूर हो रहे हैं

राधे को जिंदगी में सब कुछ मिला है प्यारे
एक आसमान भरकर तारे गगन के सारे
 पाकर के अब कन्हैया पुरनूर हो रहे हैं
हम लेखनी से अपने मशहूर हो रहे हैं