Tuesday, 18 September 2018

ग़ज़ल " खूबसूरत ख्याल लिखती हूँ "( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

 खूबसूरत ख्याल लिखती हूँ
 खूबसूरत ख्याल लिखती हूँ
 फिर मैं अपना ही हाल लिखती हूँँ

 अनगिनत दे रहे हो तुम तो जवाब
मैं हमेशा ही उलझे सवाल लिखती हूँ

 आईना झूठ भी कहता नहीं
फिर ना कहना बवाल लिखती हूँ

 मैंने गीतों में तुमको ढाला है
 शायरी में कमाल लिखती हूँ

 तुझको पाकर भी खो दिया मैंने
 प्यार को मैं मलाल लिखती हूँ

 दिल तो रोशन तुम ही से है मेरा
 दिल को फिर क्यों हलाल लिखती हूँ

 लूटकर ले गया वह राधे को
 ग़ज़ल में चाल-ढाल लिखती हूँ

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दोहे "दिखता नहीं जमीर" "( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ),

 
आधी धरती बन गई, इंसा की जागीर l
 धन दौलत तो दिख रही, दिखता नहीं जमीरll

 नजरों से नजरें मिली, हुई नजर से बातl
 अपनों की नजरें फिरी, हुई दिवस में रातll

 कुछ समझाना मित्र को, मत कर ऐसी भूलl
 समझाने को  है अभीसमय नहीं अनुकूलll

 झूठी बातों का नहीं, होता  है आधारl
सच्चाई से कीजिए, दुनिया में व्यापारll

 घर के टुकड़े हो गए, बिगड़ा आज चरित्र l
बँटवारा माँ-बाप का, कैसे होगा मित्रll

 गुस्से से कहना नहीं, अपने मन की बातl
 पहुँचाता तो क्रोध है, अपनों को आघातll

Monday, 17 September 2018

दोहे "वट पीपल की छाँव" ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " ),



तम को हरदम ही हरे, नन्हा माटी दीप l

 अँधियारे में राखिए, दीपक आप समीप ll

 सभी खोजते आज तो, वट पीपल की छाँव l 
 जिनमें शीतल छाँव है, नहीं रहे वो गाँव ll

 रिश्तो में मिलता सदाआदर प्यार-दुलार l
बिना वजह करना नहीं, आपस में तकरार ll

बड़ी मछलियाँ खा रहीं, जल की छोटी मीन l
इसीलिए तो नस्ल सब, होने लगीं विलीन ll

 बेटी को मत समझना, जीवन में ब भा l
 दोनों कुल की है सुता, एक सफल आधारll


Sunday, 16 September 2018

दोहे " मिट्ठू राम "( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

मिट्ठू राम 
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 शुकः कहो तोता कहोया फिर मिट्ठू राम 

हर पल ही जपता रहेमन से वह हरि नाम।।

नहीं सुरक्षित अब रही ,बेटी रक्षित आज
बेटों के प्रति हो रहा, अर्पित सकल समाज।।

 सत्कर्म करते नहीं, कभी मनुज को भ्रष्ट।
 दुष्कर्मों से मत करो, समय कभी भी नष्ट ।।

वाणी से होती सदा, इंसान की पहचान
गुरुओं का जग में कभी, करना मत अपमान ।।

घर की सारी खिड़कियां, होती है वरदान।
 धूप-छांव सब दे रही, हरदम यह अविराम।।

 चलने है सद्मार्ग तो, अच्छी रखना सोच
जब सीधा पथ मिले तो, कभी ना आती मोच।।

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Saturday, 15 September 2018

निर्भया( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )


निर्भया 
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 निर्भया के साथ जो कुछ था हुआ
उसने तो पूरी धरा को था छुआ
 रात का अंधियार अब भी बोलता है
 ईमान निशा काल में क्यों डोलता है
 कर ले तू जप तप और करले ध्यान तू
नहीं पायेगा जीवन में यह तब व्यवधान तू
 पर नारि को सदा अपने माँ  ही जान
बहिना , पुत्री और उसको देवी ही मान
 रंग लाएगी यह तेरी सोच भी
 आएगी तुझ पर ना कोई खरोच भी
सोच ले पहले कदम फिर तू बढा
 मनुज है मत दैत्य को खुद पर चढा
 कह रही राधे अभी इत्मीनाम से
गुजरेगा अभी तो तू कितने इम्तिहान है

Friday, 14 September 2018

गीत "हिंदी पर अभिमान कीजिए " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

 हिन्दी  पर अभिमान कीजिए
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भारत में रहने वालों हिंदी पर अभिमान कीजिए 
अपनी भाषा बोली पर इस जीवन को बलिदान कीजिए

 साल में केवल इक दिन लोगों क्यों करते हिंदी को याद
 खामोशी से  तड़प रही है करती है हिंदी फरियाद 
हर पल हर दिन तुम हिंदी का लगातार सम्मान कीजिए
 अपनी भाषा बोली पर इस जीवन को बलिदान कीजिए

 जब हो धरा गगन की बातें भूलो मत चंदा तारे
 हिंदू मुस्लिम सिख इसाई आपस में भाई सारे
 मानव होने पर इस तन पर थोड़ा तो अभिमान  कीजिए
 अपनी भाषा बोली पर इस जीवन को बलिदान कीजिए

 अज्ञानी को ज्ञान बांटते यह हिंदी की बिंदी है 
राष्ट्रीय एकता का प्रतीक ये अपनी प्यारी हिंदी है 
हिंदुस्तान को हिंदी से लोगों अब तो धनवान कीजिए 
अपनी भाषा बोली पर इस जीवन को बलिदान कीजिए 

संस्कृत उर्दू पाली प्राकृत से अपनी पहचान करो 
अंग्रेजी को भूल  जाओ पर हिंदी  पर अभिमान करो 
हिंदी को अपनाकर तुम खुद पर भी स्वाभिमान कीजिए 
अपनी भाषा बोली पर इस जीवन को बलिदान कीजिए

Thursday, 13 September 2018

दोहे "हिन्दी है सबसे सरल" (राधा तिवारी "राधेगोपाल")

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हिन्दी ने कितने किये, पार यहाँ सोपान।
संस्कृत, पाली-प्राकृत, से पाया सम्मान।।

हिन्दी भाषा को नहीं, मिला अभी सम्मान।
शासन-शिक्षा में नहीं, बनी अभी तक शान।।

आपस में सम्पर्क का, हिन्दी है आधार।
हिन्दी को मन से करो, सभी आज स्वीकार।।

लोकदिखावा कर रहे, हिन्दी का सब आज।
अंग्रेजी को बोलता, अब भी आज समाज।।

हिन्दी है सबसे सरल, कहते सारे लोग।
फिर भी इंग्लिश का लगा, आज भयानक रोग।।
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दोहे " कलम सदा चलती रहे"( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )

 कलम सदा चलती रहे
दोहे मैं तो लिख दिएमैंने राधेश्याम।
 कलम सदा चलती रहेराधे की अभिराम।।

 धाम धरा धन छोड़करजाए वन की ओर।
 संत जनों ने छोड़ दी ,निज कुटुम्ब की डोर।।

 बच्चों से तो मोह हैलेकिन प्यारा कंत 
छोड़ो मत परिवार कोकहते ज्ञानी संत।।

 मोह जगत का छोड़ दोयह है मायाजाल 
साधु संतों के लिएसदन बना जंजाल ।।

कुटिया जंगल में बनाकरते साधन योग।
 ऐसे साधु संत कोलगता कभी  रोग।।

सरल स्वभाविक  संतजनकरता जग उद्धार।
 निर्धन बन वन में करेंजीवन नैया पार ।।
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