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Friday, 25 May 2018

दिलवर (राधा तिवारी " राधेगोपाल " )



 दिलवर



जरूरी तो नहीं इतना किसी से दिल लगा बैठो।
लगाया है जो दिल उनसे, भरोसे पर खरा बैठो।।

गलत कहना उन्हें मत तुम, कोई भी दोष मत देना।
बनो तुम अपसरा जैसी, दिलों में शान से बैठो।।

 लड़ाई मत करो उनसे, सहारा बन के दिखलाओ।
उन्हीं के प्यार में अपने, सभी गम तुम भुला बैठो।।

कमाया है अगर उसने, तो घर में काम आयेगा।
मगर इकरार करके यूँ, नहीं इनकार कर बैठो।।

तुम्हारी इस कमाई पर ,सदा अधिकार मेरा है 
सजा देने की तो दिल में, कभी मत ठानना दिलवर।
यह अच्छा है नहीं प्रियवर कि राधे को भुला बैठो।।




Thursday, 24 May 2018

जिंदगी का हिसाब (राधा तिवारी "राधेगोपाल " )


  जिंदगी का हिसाब 


प्यार से भरी मैं किताब लिख रही हूँ ।
 खुद से ही प्रश्न करके जवाब लिख रही हूँ।।

काँटों भरी धरा तो सब ओर दिख रही है।
 लेकिन धरा को मैं तो गुलाब लिख रही हूँ ।।

हैं चाँद और सितारे रात में चमकते।
 सूरत को ही मैं अपनी आफताब लिख रही हूँ।।

जैसा दिख रहा है वैसा  नहीं है जीवन।
मैं ज़िन्दगी को सुंदर नकाब लिख रही हूँ।।

 लब्ज़ों मैं खुद को ढूंढो मुमकिन नहीं है राधे।

 मैं खुद ही जिंदगी का हिसाब लिख रही हूँ।।










Wednesday, 23 May 2018

चले आए हो ( राधा तिवारी " राधेगोपाल ")




चले आए हो


चले आए हो तो बता कर तो आते।
 कभी हम सताते कभी तुम सताते।।

 दिलों की यह दूरी तो कम हो गई है ।
जमाने से हम प्यार को है छुपाते।।

 सपनों में तुम रोज आते रहे हो।
 कभी मेरी नजरों में आकर दिखाते।।

 इशारों इशारों में सब कह गए हो।
 तुम्हारे तो अल्फाज है याद आती।।

 धड़कन बढ़ मेरी तुम ने जब देखा।
 तुम्हें देख धड़कन को हम भी बढ़ाते।।

कभी हम सताते कभी तुम सताते 
 बताओ तो कैसे हम धड़कन घटाते 



Tuesday, 22 May 2018

विदाई समारोह (राधा तिवारी:" राधेगोपाल "

खटीमा ब्लॉक के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, लेक्चरर, टीचर विदाई समारोह के 
शुभ अवसर पर ब्लॉक सभागार खटीमा में 
आज 22/05/ 2018 को।
इस अवसर पर मैंने अपना एक गीत गाकर सुनाया
रहे साथ जो सदा हमारे, उनकी याद हमें आएगी।
जीवन के हर दोराहे पर, राधा गीत सुनायेगी।।

जीवन भर तुमने शिक्षा के, इस उपवन को सींचा है।
मुरझाने नहीं दिया कभी भी, तुमने यह बगीचा है।।
दूर चले जाओगे जब तुम, खुशियाँ मन बहलाएगी।
जीवन के हर दोराहे पर, राधा गीत सुनायेगी।।

संघर्षों से तुमने इतनी, ऊँचाई को पाया है ।
अध्यापन से अपना तुमने, कीर्तिमान बनाया है।।
जगह हुई जो रिक्त तुम्हारी, कभी नहीं भर पाएगी।
जीवन के हर दोराहे पर, राधा गीत सुनायेगी।।

धन्य धन्य सौभाग्य हमारे, मिले हमें ऐसे साथी।
तम को सदा हटा देते जो, लेकर दिया और बाती।।
नई पौध इस पगडंडी से, कांटे सदा हटाएगी।
जीवन के हर दोराहे पर, राधा गीत सुनायेगी।। 

Monday, 21 May 2018

"खटीमा में कविगोष्ठी" सुनिए मेरी आवाज (राधा तिवारी)

खटीमा-20/05/2018 को दोपहर में  वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक के निवास पर दो सत्रों में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। पहले सत्र  में कवियों ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया। जिसकी अध्यक्षता कवयित्री राधा तिवारी राधेगोपालने की।
आइये सुनिए मेरी यह "ग़ज़ल" ....

चल पडो तब रुक न जाना ,देख कर यह रास्ते l
अब तुम्हे चलना ही होगा इस वतन के वास्ते”

 हार हो या जीत हो, या जान मुश्किल में कभी ।
जान -ए-दिल कुर्बान करना, इस वतन के वास्ते ।।

 वक्त हो कैसा भी तुम, डर कर कभी रुकना नहीं ।
कदम तो बढ़ते रहें, अपने वतन के वास्ते ।।

सर्दी गर्मी धूप हो, चाहे हवा प्रतिकूल हो ।
पर्वतों को भी लाँघ जाना, तुम वतन के वास्ते।

 दूध माता का पिया है , कर्ज तो उसका चुका।
 फर्ज है बलिदान होगा ,  वतन के वास्ते ।।

शत्रु से डरकर सरहद से, भागकर आना नहीं ।
कह रही राधे कटाना, सिर वतन के वास्ते ।।


 
दूसरा सत्र में क से कविताके रूप में प्रारम्भ हुआ जिसमें बालककवि के रूप में पधारे आकाश कुमार ने पाठ्यपुस्तक की एक रचना का पाठ किया। डॉ.सिद्धेश्वर सिंह ने ग़ज़लगो मोमिन की गजल वो जो हममें तुममें करार था, तुम्हे याद हो कि न याद होका वाचन किया, मेजबान डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कविवर सुमित्रानन्दन पन्त के जन्म दिवस पर उनकी रचना मैं पतझड़ का जीर्ण पातऔर हाल ही में स्मृतिशेष हुए स्व. बालकवि वैरागी की रचना अपनी गन्ध नहीं बेचूँगाको पढ़ा। श्री श्रीभगवान मिश्र ने सरस्वती वन्दना का सस्वर पाठ किया। आश्रम पद्धति विद्यालय से पधारे रामरतन यादव ने मंगलेश डबराल की रचना का वाचन किया। इस अवसर पर जय शंकर चौबे, पूरन बिष्ट तथा कैलाश पाण्डेय ने भी काव्यपाठ किया। कार्यक्रम में श्री पूरन बिष्ट को उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री हासिल करने पर उनकी भूरि-भूरि सराहना की गयी और उनको बधाई दी गयी।



अन्त में राधा गोपाल तिवारी ने दुस्यन्त कुमार की प्रसिद्ध गजल हो गयी है पीर पर्वत सी...को तरन्नुम के साथ गाया और गोष्ठी में समाँ बाँध दिया।


Sunday, 20 May 2018

चांद सी मुनिया (राधा तिवारी "राधेगोपाल ")



 चांद सी मुनिया



मेरी जब चांद सी मुनिया, मेरे आंगन ठुमकती है ।
तेरी अठखेलियों से ही ,मेरी गोदी दमकती है ।।
कभी बिंदिया मेरी ले कर ,स्वयं को तू लगाती है ।
रोशन हो तेरी सूरत ,सितारों से चमकती है ।।
कभी बनकर परी नन्ही, तू ख्वाबों को सजाती है।
 कभी मेरी छवि बन कर, तू मुझ में ही संवरती है ।।
कभी जब डांटकर तुझको, मैं खुद से दूर करती हूँ।
तू माँ  माँ कहकर के ,तब मुझ से लिपटती है।।
 तेरी अटखेलियां हरदम ,ही राधे को लुभाती है।
 तेरी सूरत सदा स्वाति ,मेरे दिल में धड़कती है।।





Saturday, 19 May 2018

इंतजार(राधा तिवारी " राधेगोपाल")




 इंतजार


दिल के फासलों को दूर करना ही पड़ेगा l 
कुछ हमें कुछ तुम्हें चलना ही पड़ेगा 

 काम कोई भी मुश्किल नहीं इस जहान में 
कोशिशें करके संभलना ही पड़ेगा 

सूरज चंदा गगन में आते जाते रहेंगे 
रौशनी के दिये को जलना ही पड़ेगा 

 इंतजार करते-करते थक गई मेरी आंखें 
जीवन में जीना है तो बदलना ही पड़ेगा 

 गुमसुम सा हो कर बैठना अच्छा नहीं जग में 
दुखी मन को भी राधे बहलना ही पड़ेगा 



Friday, 18 May 2018

ग़ज़ल "यहाँ गुलशन सजाना है" (राधा तिवारी "राधेगोपाल" )

गुलशन
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मुझे है आज यह चिंता, के घर कैसे बनाना है।
वतन के वास्ते हमको, यहाँ सब कुछ लुटाना है।

 गरीबों की हुई मुश्किल, बढ़ी महँगाई है इतनी ।
गरीबों को नहीं मिलता, सही खाना खजाना है।

उठे किलकारियां घर में, महक जाए चमन अपना।
कली फूलों से अब हमको, यहाँ गुलशन सजाना है।।

हमें यह पूछना है, कामगारों से जमाने के।
 फरेबी है जगत कैसे, यहाँ नेकी कमाना है।।

 बताते हैं बड़े हमको, कि ईश्वर हम में रहता है ।
यही चिंता है राधे को, किसे इंसा बताना है।।

Thursday, 17 May 2018

"दायरे" (राधा तिवारी 'राधेगोपाल')

नभ से बादल सभी आज छटने लगे।
देखो जंगल से भी पेड़ कटने लगे।
   चौड़ी होती गई अब तो सँकरी सड़क
दायरे तो दिलों के सिमटने लगे।
 कोकिला पड़ गई देखकर सोच में
 सुर सजाएँ कहाँ पेड़ घटने लगे।
 अब समय है कहाँ बालकों के लिए
काम पर मां-बाप खटने लगे।
 आज इंसानियत का न मतलब कोई
 दिल तो राधे के भी आज फटने लगे।।


Tuesday, 15 May 2018

"मिटठू" राधा तिवारी ' राधेगोपाल '

मिट्ठू

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इक प्यारा सा तोता, देखा आज बगीचे में।
मिट्ठू-मिट्ठू बोल रहा था, तोता खूब दलीचे में।l

उड़ा तभी वह हरियल तोता, गया सहेली लाने।
और साथ में हरी मिर्च भी, लाया सँग में खाने।।

बैठ गये दोनों फिर मिलकर, करते बातें मतवाली।
पंजों से कसकर दोनों ने, पकड़ी शाखा हरियाली।।

खाने लगे चाव से दोनों, हरी मिर्च वो मोटी।
एक ने उसकी पूँछ पकड़ ली, और दूसरे ने चोटी।।

मिर्ची के दानों को खातेमिट्ठू-मिट्ठू कहते।
दुनिया उनको नहीं सुहाती , खुद अपने में गुम रहते ।।

हरा भरा था पेड़ बाग में , हरे-हरे थे उनके पर।
हरी मिर्च खा-खाकर, उड़ते थे दोनों नभ में फर-फर।।

राधे के मन को भाती है,मिट्ठू की बोली प्यारी
तोते के आते ही हो जाती, रौशन बगिया सारी।।