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Saturday, 20 January 2018

ग़ज़ल "चुपके चुपके"

याद आने लगे वो हमें चुपके चुपके 
दिल को लुभाने लगे  चुपके चुपके 

पल-पल की खबर रखते थे जो मेरी 
हमें यूं ही तडपाने लगे हैं चुपके-चुपके 

खता थी हमारी कि झुकते गये हम
तभी वो झुकाने लगे चुपके चुपके 

मेरी ख्वाहिशों अब तो खामोश सी हैं
गजल गुनगुनाने लगी चुपके चुपके 

वो वादे-इरादे में कैसे भुला दूँ
सताने लगे सब हमें चुपके चुपके
राधा तिवारी

Monday, 8 January 2018

कविता "ओ मेरे प्यारे बचपन" (राधा तिवारी)

ओ मेरे प्यारे बचपन तुमको मैं भूलूंगी कैसे
तुम साथ सदा मेरे रहते बसते हो मेरी धड़कन हो

मेरी तुतलाती बोली पर, माँ जाती थी बलिहारी
मेरी वह नटखट शोख-अदाएँ पापा को लगतीं प्यारी

कहाँ गए वो खेल खिलौने जो सखियों संग थी खेली
कंचे-गोटी, गिल्ली-डंडा लगती मानों एक पहेली

क्या मेरे प्यारे बचपन तू फिर से वापस आएगा
क्या वह बचपन की बातें फिर से तू याद दिखलायेगा

ऐ मेरे बचपन मैं तुझको कभी भूल नहीं पाऊँगी
पर अपने बच्चों में तुझको फिर से मैं पा जाऊँगी