उन्हें न मिलता ज्ञान है, जो होते मक्कार।।
जिसकी होती गरज है, वह बन जाता खास।। वरना पूरे विश्व में, मेला रहे उदास।। सच को कहने में कभी, मत करना संकोच।।
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Friday, 26 July 2019
दोहे , " गुरु उन्हें हैं डांट " (राधा तिवारी " राधेगोपाल " )
बाल कविता', " (राधा तिवारी " राधेगोपाल " )
बाल कविता
सर्दी का अनुभव होता है
अब आया है जाड़ा
कंबल के अंदर छिपकर के
नीलू पड़े पहाड़ा
बाहर कैसे आऊं कहता
लगती बहुत ही सर्दी
सूरज दादा जब आएंगे
तब पहनूंगी वर्दी
स्वेटर मफलर शाल रजाई
मुझको बहुत लुभाते
पर दिन तो छोटे हो गए हैं
लंबी हो गई रातें
अब तो जाड़े भर रहेगा
पैर पे मेरे मोजा
पर माँ मिला नहीं है जोड़ा
सारा घर ही खोजा
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Thursday, 25 July 2019
Wednesday, 24 July 2019
दोहे, "छोटी चिड़िया" (राधा तिवारी "राधेगोपाल ")
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Tuesday, 23 July 2019
दोहे, हिंदी (राधा तिवारी "राधेगोपाल " )
हिंदी
हिंदी को जब मिलेगा, सकल विश्व में मान।
तब सारे संसार में, हो इसका गुणगान।।
गीत गजल से कर रहे, कविवर इसका मान।
कविता लिख कर ही बने, लोग यहां गुणगान।।
हिंदी भाषा से करो, हिंद वासियों प्यार।
हिंदी की है विश्व में, महिमा अपरंपार।।
मची हुई संसार में, अब हिंदी की धूम।
सभी जगह पर मान है, परदेशों में घूम।।
तुलसी और कबीर से, हिंदी है गुलज़ार।
भारत वालों तुम करो,निज हिंदी से प्यार।।
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Monday, 22 July 2019
गजल, " माँ " (राधा तिवारी " राधेगोपाल " )
माँ जल रहा है तन बदन लग रही ज्यों आग है
रोशनी से है भरा घर का हर इक भाग है
ऐ रवि आकर के देखो रात में भी तुम कभी
चांद पर भी लोग कहते हैं कि काला दाग है
रिश्ते नातों को संभालो टूटते ही जा रहे
डस रहे हैं अब सभी को संबंध के ही नाग हैं
घोर कलयुग में कहाँ पर हंस चुगते मोतियां
कोयल के भी घोंसले में दिख रहे अब काग है
अन्न जल और फूल फल से ये धरा आबाद है
खा रहे हैं जानवर अब घास के संग साथग हैं
माँ से सुनकर लोरियाँ सब यहाँ बढ़ते रहे
भूलते अब बालपन के राग और अनुराग हैं
कह रही राधे की जीवन है बहुत ही कीमती
गांठ से जो जुड़ ना पाए यह वही तो ताग है
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दोहे, " दीपों की ज्योति " ( राधा तिवारी "राधेगोपाल " )
दीपों की ज्योति
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देव दिवाली नाम से ,है यह पर्व महान।
गंगा तट पर हो रहे, लाखों दीपक दान।।
दीपों की ज्योति सदा, यूं ही जलती जाए।
काम क्रोध अब ना रहे, मन निर्मलता पाए।।
नदी किनारे कर रहे ,सब जल में स्नान।
देव पूजकरके करो, इष्ट देव का ध्यान ।।
कार्तिक की है पूर्णिमा, पावन है दिन वार।
दीप जलाकर प्यार से, मना रहे त्यौहार।।
मंत्रोच्चारण को करें, कर लो पूजा जाप।
कार्तिक की है पूर्णिमा, तीरथ जाओ आप ।।
मन को निर्मल कीजिए, गंगा में कर स्नान।
शुद्ध हृदय में ही बसे, दयानिधि भगवान ।।
लोभ मोह के पाश में, नहीं बधेंगे राम ।
मन माया को छोड़ दे, बन जाएंगे काम ।।
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